2006 सीरियल बम धमाकों के मामले में हाईकोर्ट से सभी आरोपी बरी, तो 31 लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन?

sagar parvez

2006 Malegaon blasts case reached dead end: High Court; raps NIA for overlooking evidence

2006 Malegaon blasts case reached dead end: High Court; raps NIA for overlooking evidence
2006 Malegaon blasts case reached dead end: High Court; raps NIA for overlooking evidence

8 सितंबर 2006 को नासिक के मालेगांव कस्बे में चार बम धमाके हुए थे। इनमें से तीन धमाके जुमे की नमाज के बाद हमीदिया मस्जिद और बड़ा कब्रिस्तान परिसर में हुए थे, जबकि चौथा धमाका मुशावरत चौक पर हुआ था। इस घटना में 31 लोगों की मौत हो गई थी और 312 लोग घायल हुए थे।

2006 Malegaon blasts case reached dead end: High Court; raps NIA for overlooking evidence

बंबई हाईकोर्ट ने 2006 के मालेगांव सिलसिलेवार बम विस्फोट मामले में चार लोगों के खिलाफ आतंकवाद सहित सभी आरोपों को खारिज करते हुए उन्हें आरोपमुक्त करार दिया। इस फैसले के साथ यह सवाल अनुत्तरित रह गया कि उन विस्फोटों के लिए कौन जिम्मेदार था, जिनमें 31 लोगों की मौत हुई थी।

मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति श्याम चांडक की खंडपीठ ने चारों आरोपियों राजेंद्र चौधरी, धन सिंह, मनोहर राम सिंह नरवरिया और लोकेश शर्मा द्वारा विशेष एनआईए अदालत के आदेश के खिलाफ दायर अपीलों को मंजूर कर लिया। विशेष अदालत ने उनके खिलाफ आरोप तय करने का आदेश दिया था।

इन चारों पर भारतीय दंड संहिता की, हत्या और आपराधिक साजिश से संबंधित विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे। साथ ही उन पर कड़े गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत भी मामला दर्ज किया गया था।

8 सितंबर 2006 को नासिक जिले के मालेगांव कस्बे में चार बम विस्फोट हुए थे। इनमें से तीन धमाके शुक्रवार की नमाज के बाद हमीदिया मस्जिद और बड़ा कब्रिस्तान परिसर में हुए थे, जबकि चौथा धमाका मुशावरत चौक में हुआ था। इस घटना में 31 लोगों की मौत हो गई थी और 312 लोग घायल हुए थे।

विस्फोटों की जांच में कई मोड़ और उतार-चढ़ाव देखने को मिले। शुरुआती जांच एजेंसियों ने दावा किया था कि इसकी साजिश मुस्लिम आरोपियों द्वारा रची गई थी, लेकिन बाद में मामले की जांच करने वाले राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) ने कहा कि इन विस्फोटों के पीछे दक्षिणपंथी चरमपंथी थे।

मामले की शुरुआती जांच महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) ने की थी, जिसने इस मामले में नौ मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया था। एटीएस ने दिसंबर 2006 में दाखिल अपने आरोपपत्र में दावा किया कि विस्फोटों को अंजाम देने की साजिश मई 2006 में एक आरोपी की शादी के दौरान हुई बैठक में रची गई थी। यह मामला बाद में फरवरी 2007 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दिया गया। सीबीआई ने अपने पूरक आरोपपत्र में एटीएस की जांच से सहमति जताई और नौ मुस्लिम पुरुषों को आरोपी के रूप में नामजद किया।

हालांकि, अप्रैल 2011 में एनआईए ने यह मामला अपने हाथ में लिया और दावा किया कि इन विस्फोटों के पीछे दक्षिणपंथी चरमपंथियों का हाथ था और उसने चार आरोपियों को गिरफ्तार किया। केंद्रीय एजेंसी ने अजमेर शरीफ (राजस्थान) और मक्का मस्जिद (हैदराबाद) विस्फोट मामलों में आरोपी स्वामी असीमानंद के एक बयान को आधार बनाया। इस बयान के अनुसार, 2006 के मालेगांव विस्फोटों को दिवंगत दक्षिणपंथी कार्यकर्ता सुनील जोशी के साथ जुड़े लोगों ने अंजाम दिया था।

हालांकि असीमानंद बाद में इस बयान से पलट गए, लेकिन एनआईए ने अपनी जांच के बाद आरोपपत्र दाखिल कर नौ गिरफ्तार मुस्लिम आरोपियों को ‘क्लीन चिट’ दे दी और इन चार लोगों को नामजद किया। वर्ष 2016 में एक विशेष अदालत ने उन नौ मुस्लिम पुरुषों को आरोपमुक्त कर दिया, जिसे एटीएस ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी। एटीएस की यह अपील अभी भी उच्च न्यायालय में लंबित है और 2019 के बाद से इस पर कोई सुनवाई नहीं हुई है।

पिछले साल सितंबर में एक विशेष एनआईए अदालत ने चार आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए। इसके बाद उन्होंने विशेष अदालत के इस आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय का रुख किया। इस वर्ष जनवरी में उच्च न्यायालय ने याचिकाओं को स्वीकार करते हुए कहा था कि हस्तक्षेप के लिए प्रथम दृष्टया मामला बनता है। साथ ही उच्च न्यायालय ने अंतिम निर्णय तक निचली अदालत की आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी।

चारों आरोपियों ने उच्च न्यायालय में अपनी याचिका में दावा किया था कि एनआईए उनके खिलाफ कोई सबूत पेश करने में विफल रही है। वर्ष 2019 में उच्च न्यायालय ने चारों व्यक्तियों (वर्तमान अपीलकर्ताओं) को यह कहते हुए जमानत दे दी थी कि उन्हें बिना मुकदमे के छह साल से अधिक समय तक जेल में रखा गया। इस तरह मालेगांव विस्फोट मामले में अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर 31 लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन है।

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