
न्यूयॉर्क में मोहन भागवत के कार्यक्रम का जबरदस्त विरोध हुआ है। इस बीच इस बात पर भी सवाल उठ रहे हैं कि आखिर विदेशों में भागवत का वह खुफिया मेजबान कौन है जो उनके ठहरने और यात्रा का खर्च उठा रहा है।
RSS chief Mohan Bhagwat’s ‘secretive New York hosts’, Who financed his trip and stay?
अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में आरएसएस मुखिया मोहन भागवत के कार्यक्रम का तीखा विरोध हुआ। मानवाधिकारों, विभिन्न धर्मों, मुस्लिम, सिख, ईसाई और दलितों से जुड़ करीब 48 संगठनों ने न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित भागवत के कार्यक्रम का विरोध किया।
प्रदर्शनकारियों ने आरएसएस की विचारधारा की आलोचना करते हुए भारत में अल्पसंख्यकों के अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता और सांप्रदायिक तनावों को लेकर चिंता जताई। इन संगठनों ने खुलेआम कहा कि आरएसएस को न्यूयॉर्क से बाहर करना चाहिए।
पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक ‘हिंदूज़ फ़ॉर ह्यूमन राइट्स’ नाम के संगठन की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर सुनीता विश्वनाथ ने दावा किया कि 61 अलग-अलग धर्मों और सेक्युलर संगठनों ने संघ कार्यक्रम के विरोध में एक खुले पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। उन्होंने कहा था कि इन समूहों के कई समर्थक व्यक्तिगत रूप से वहां पहुंचेंगे और यह संदेश देंगे कि “RSS और उनकी हिंदुत्व विचारधारा हमारा प्रतिनिधित्व नहीं करती है।”
शनिवार को जब भागवत का कार्यक्रम हुआ तो काफी संगठन विरोध स्वरूप आयोजन स्थल के बाहर बैनर-पोस्टर लेकर मौजूद थे।
ऐसे ही एक संगठन इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (आईएएमसी) और उससे जुड़े समुदाय और धार्मिक संगठनों ने भी प्रेस कांफ्रेंस कर मोहन भागवत के कार्यक्रम का विरोध करने का ऐलान किया था।
“नफ़रत के लिए कोई मंच नहीं” (नो प्लेटफॉर्म फॉर हेट) बैनर तले हुए इस विरोध प्रदर्शन में मुस्लिम, हिंदू, सिख, ईसाई, दलित और अलग-अलग धर्मों के संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इन संगठनों का कहना था कि भागवत हिंदू वर्चस्ववादी विचारधारा के समर्थक हैं और उनका संगठन आरएसएस ‘अल्पसंख्यक-विरोधी’ है।
इस बीच मीडिया रिपोर्ट से सामने आया है कि मोहन भागवत न्यूयॉर्क में सेंट्रल पार्क के सामने बने लग्ज़री होटल ‘द पियरे’ में रुके थे, जो ताज ग्रुप का होटल है। उन्होंने हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और सिख संगठनों के विरोध और न्यूयॉर्क से ‘हिंदुत्व’ को दूर रखने की मांग के बीच शनिवार को मैडिसन स्क्वायर गार्डन में कार्यक्रम को संबोधित किया।
इस कार्यक्रम में यूं तो उन्होंने बहुत अच्छी बातें कहीं और एकता और भाईचारे के बारे में प्रभावशाली ढंग से बात रखी। लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि भागवत अमेरिका का दौरा क्यों कर रहे हैं। भागवत के तीन देशों के दौरे में कनाडा और यूके भी शामिल हैं। सवला इस पर भी उठ रहे हैं कि उनके दौरे में ठहरने का खर्च किसने उठाया? क्या यह दौरा फंड जुटाने के लिए है? या फिर यह दौरा किसी ‘आउटरीच प्रोग्राम’ के तहत अमेरिकी कांग्रेस के सदस्यों और प्रशासन के साथ लॉबिंग करने के लिए है? राजनीति
लेखक और पत्रकार सलिल त्रिपाठी ने ‘द वायर’ को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि हालांकि भारतीय कांउसुलर स्टाफ और व्यापारियों के संघ प्रमुख से मिलने की बात तो पता है, लेकिन उन्हें व्यक्तिगत रूप से भागवत की किसी भी कानून-निर्माता (सांसद) या प्रशासनिक अधिकारी के साथ बैठक के बारे में जानकारी नहीं है।
सलिल त्रिपाठी ने साफ़ तौर पर कहा कि भले ही वह भागवत के अमेरिका दौरे और आरएसएस के आलोचकों के उस दौरे का विरोध करने के अधिकार का समर्थन करते हैं, लेकिन वह चाहते थे कि भागवत आरएसएस के विज़न और कामकाज पर आलोचकों के साथ बहस के लिए तैयार होते। कुछ आलोचकों का यह भी कहना है कि अगर भागवत और संघ अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच होने वाली बैठक को लेकर गंभीर होते, तो वे न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान मम्दानी को बुलाते और उनके साथ सार्वजनिक बातचीत करते।
लॉबिंग से जुड़े विवाद के बाद भागवत का यह पहला दौरा है और कुछ लोग इसे डैमेज कंट्रोल की कोशिश के तौर पर भी देख रहे हैं। 2025 में, वॉशिंगटन डीसी की सबसे बड़ी लॉबिंग फर्मों में से एक, स्क्वॉयर पैटन बॉग्स (एसपीबी) ने इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के को ईमेल करके संघ की ओर से उनसे मिलने का समय मांगा था। फर्म ने बताया कि संघ ने अमेरिकी सांसदों को अपने मिशन के बारे में जानकारी देने के लिए एसपीबी की सेवाएं ली थीं। फर्म ने अमेरिकी कानून के तहत आरएसएस के लिए लॉबिंग करने के लिए रजिस्ट्रेशन कराया था और जानकारी दी थी कि उसे शुरुआती तीन तिमाहियों में 330,000 डॉलर (लगभग 3 करोड़ रुपये) मिले थे।
जब यह खबर चर्चा में आई, तो संघ प्रवक्ता सुनील आंबेकर ने इस बात से इनकार किया कि आरएसएस ने अमेरिका में किसी लॉबिंग फर्म की सेवा ली थी। इसके एक हफ़्ते बाद, आरएसएस के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइज़र’ ने आंबेकर के बयान का खंडन किया और दावा किया कि अमेरिकी कानूनों के तहत इस संपर्क-अभियान की पूरी जानकारी दी गई थी। बाद में प्रकाशन ने उस रिपोर्ट को हटा दिया। विवाद इसलिए भी बढ़ा क्योंकि इस प्रक्रिया को ‘फ़ॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट’ के बजाय ‘लॉबिंग डिस्क्लोज़र एक्ट’ के तहत दर्ज किया गया था; क्योंकि दूसरे कानून के तहत हर मीटिंग, ईमेल, कॉल और लेन-देन की जानकारी सार्वजनिक करना ज़रूरी होता। कुछ हफ़्तों के भीतर ही एसपीबी ने संघ की जगह मैसाचुसेट्स के फ़ार्मास्युटिकल एग्ज़ीक्यूटिव विवेक शर्मा को अपना क्लाइंट बना लिया। इसके बाद दिसंबर 2025 में यह कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिया गया।
अल जज़ीरा की एक रिपोर्ट के मुताबिक, न्यूयॉर्क में भागवत के कार्यक्रमों के मुख्य आयोजक अमेरिका में स्थित एक नॉन-प्रॉफिट ग्रुप ‘अमेरिकन हिंदूज़ फॉर एंगेजमेंट एंड डायलॉग’ (AHEAD) फ़ोरम है, जो मई 2025 में एक नॉन-प्रॉफिट संस्था के तौर पर रजिस्टर हुआ था। अमेरिकी आईआरएस के डेटा से पता चलता है कि इस संस्था के मौजूदा डायरेक्टर सुदेश अग्रवाल, नरेश राजनन्ना और रसिता विष्णुराम हैं।
अमेरिका में संघ का विरोध करने वाले एक संगठन ‘सवेरा’ ने बताया कि अग्रवाल ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ’ (एचएसएस) के क्लीवलैंड चैप्टर को चलाते हैं और राजनन्ना भी एचएसएस के एक्टिविस्ट हैं। विष्णुराम ‘ब्लूक्राफ्ट फ़ाउंडेशन’ में सीनियर फ़ेलो हैं; यह मोदी-समर्थक प्रोपेगैंडा यूनिट है जिसे “मोदी सरकार से जुड़े सबसे प्रभावशाली, लेकिन सार्वजनिक रूप से कम दिखने वाले कम्युनिकेशन प्लेटफ़ॉर्म में से एक” बताया जाता है।
उनके नाम से बनी और राजन्ना के न्यूयॉर्क वाले पते से जुड़ी एक वेबसाइट साफ़ तौर पर बताती है कि वह दुनिया के नेताओं को आरएसएस के बारे में समझाने के लिए नौ मोर्चों पर काम कर रही है। वेबसाइट का तर्क है कि भारत को समझने के लिए “हिंदू धर्म को भारत की आत्मा और आरएसएस को एक प्रेरक विचारधारा के तौर पर समझना ज़रूरी है”।
आरएसएस के इस आउटरीच प्रोग्राम के पीछे मुख्य व्यक्ति सौमित्र गोखले हैं। वे अधेड़ उम्र के व्यक्ति हैं जो हिंदू स्वयंसेवक संघ (एचएसएस) की अमेरिकी शाखा का नेतृत्व करते हैं। संगठन के रिकॉर्ड में उन्हें “योग प्रशिक्षक” के तौर पर दर्ज किया गया है और 2015 से उन्हें सालाना 36,000 डॉलर का वेतन मिल रहा है। हालांकि, ‘सवेरा’ की एक रिपोर्ट बताती है कि वे केवल योग प्रशिक्षक से कहीं अधिक हैं। गोखले हर साल आरएसएस की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ में शामिल होते हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि गोखले द्वारा असल में योग करने या सिखाने का कोई लिखित प्रमाण नहीं है।
“भारत और उत्तरी अमेरिका के बीच बार-बार यात्रा करने के अलावा, गोखले ऑकलैंड, बोगोटा, नैरोबी, टोक्यो, मैक्सिको सिटी, गुयाना, त्रिनिदाद और सूरीनाम जैसी अलग-अलग जगहों की भी यात्रा करते हैं। रिपोर्ट में यह बात कही गई है और कई ऐसे सवाल उठाए गए हैं जिनका अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है।


