पश्चिम बंगाल: हाईकोर्ट के पूर्व जज शाहिदुल्लाह मुंशी का नाम वोटर लिस्ट से हटा, बोले “यह बेइज्जती है” चुनाव आयोग की भूमिका पर फिर सवालिया निशान

sagar parvez

West Bengal | Left out of voters’ list, former HC judge Sahidullah Munshi questions ECI and SIR

West Bengal | Left out of voters’ list, former HC judge Sahidullah Munshi questions ECI and SIR
West Bengal | Left out of voters’ list, former HC judge Sahidullah Munshi questions ECI and SIR

कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस शाहिदुल्लाह मुंशी का कहना है कि उन्होंने नहीं समझ आ रहा कि वे किस आधार पर इस चूक को चुनौती देंगे? जस्टिस मुंशी का नाम ‘नॉट फाउंड’ श्रेणी में रखा गया है।

West Bengal | Left out of voters’ list, former HC judge Sahidullah Munshi questions ECI and SIR

जस्टिस सहीदुल्लाह मुंशी और उनके परिवार के सदस्यों के नाम चुनाव आयोग द्वारा 28 फरवरी को जारी की गई ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से गायब थे। इस पर जस्टिस मुंशी, उनकी पत्नी और बेटों ने जरूरी कागजात बीएलओ के पास जमा कराए और अधिकारियों के सामने सुनवाई के दौरान उनकी संतुष्टि के लिए पेश भी हुए ताकि दस्तावेजों का वेरिफिकेशन हो सके। इतना सब होने के बाद भी जब संशोधित वोटर लिस्ट आई तो उनकी पत्नी और बेटों के नाम के आगे ‘अंडर एडजुडिकेशन’ लिखा हुआ था। उनके अपने नाम के आगे ‘नॉट फाउंड’ लिखा हुआ था, जो सप्लीमेंटरी लिस्ट में था।

सेवानिवृत्त जस्टिस मुंशी ने एक गलती की। और वह यह कि उन्होंने सुनवाई के दौरान यह नहीं बताया कि वे हाईकोर्ट के जज के पद से रिटायर हुए हैं। कानूनी मामलों की वेबसाइट बार एंड बेंच से बातचीत में उन्होंने कहा उन्होंने जानबूझकर अपने पुराने पद के बारे में नहीं बताया था। उन्होंने कहा, “मैं कोई भी ऐसा दस्तावेज नहीं देना चाहता था जिसमें यह लिखा हो कि मैं हाईकोर्ट का रिटायर्ड जज हूं, क्योंकि मैं चाहता था कि मेरे साथ भी आम नागरिकों जैसा ही सुलूक हो। इसीलिए मैंने अपने पासपोर्ट समेत सभी दस्तावेज सही तरीके से पेश कर दिए थे।”

जस्टिस मुंशी अकेले ऐसे वोटर नहीं हैं। उन जैसे लाखों वोटर ऐसे हैं जिनका नाम वोटर लिस्ट से काट दिया गया है और उन्होंने सभी दस्तावेज दे दिए थे, इसका कोई सबूत भी नहीं है। इतना ही नहीं उनके पास इसका भी कोई सबूत नहीं है कि वे सम्मन मिलने पर सुनवाई के लिए पेश हुए थे। न ही इस बात का सबूत है कि सुनवाई में अधिकारियों ने उनसे क्या सवाल पूछे और क्या वे अपने जवाबों से चुनाव आयोग के अधिकारियों को संतुष्ट कर पाए। जस्टिस मुंशी ने बताया कि, “अगर आयोग यह कहे कि उनके दस्चावेज दुरुस्त नहीं थे. तो मुझे नहीं पता कि मैं इसे कैसे चुनौती दूंगा क्योंकि मुझे कोई रसीद तो दी नहीं गई थी।”

दो चरणों में होने वाले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन की आखिरी तारीखें 8 और 12 अप्रैल 2026 हैं, लेकिन अभी तक यह साफ नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित अपीलीय ट्रिब्यूनल कैसे, कहां और कब से काम करना शुरू करेंगे। जस्टिस मुंशी कहते हैं कि, “जो 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल गठित किए गए हैं, वे केवल कागज़ों पर ही हैं। इस बारे में कोई दिशानिर्देश नहीं हैं कि वे ट्रिब्यूनल कैसे काम कर सकते हैं और वे क्या कर सकते हैं। मुझे नहीं पता कि मुझे किससे संपर्क करना चाहिए।”

उन्होंने कहा कि, “प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन के आधार पर इस चूक को चुनौती देने के अलावा, मेरे पास कोई और आधार नहीं है जिस पर मैं अपीलीय ट्रिब्यूनल में जा सकूं; और यदि अपीलीय ट्रिब्यूनल इसे उचित नहीं मानता है, तो मुझे अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का का रुख करना होगा।”

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) विशेष रूप से अव्यवस्थित रहा है, और इसके लिए चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट, दोनों ही समान रूप से जिम्मेदार हैं। ज़मीनी स्तर पर लोगों में गुस्सा और हताशा साफ दिखाई दे रही है। जिन मतदाताओं को अन्यायपूर्ण तरीके से सूची से बाहर कर दिया गया है, उनमें चुनाव आयोग और उसके अधिकारियों के प्रति गहरा रोष है।

लेकिन इस सब के बावजूद चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) की खामोशी से जमीनी स्तर पर असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है क्योंकि आयोग के अधिकारियों ने अब तक तमाम गड़बड़ियों की कोई भी ज़िम्मेदारी लेने, या कोई स्पष्टीकरण देने से भी इनकार कर दिया है।

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