कर्ज में डूबा राज्य, लेकिन उत्तराखंड सरकार ने छवि चमकाने विज्ञापन पर खर्च किए 1001 करोड़

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Humanity shamed, crores spent: Uttarakhand’s contradictory realities

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Humanity shamed, crores spent: Uttarakhand’s contradictory realities

धामी सरकार अपनी छवि चमकाने के लिए विज्ञापन के मद में एक हजार करोड़ खर्च रही है, जबकि तमाम जरूरी काम बाकी।

Humanity shamed, crores spent: Uttarakhand’s contradictory realities

अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी छवि चमकाने पर हजारों करोड़ रुपये खर्च कर सकते हैं, तो बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री क्यों पीछे रहें? उत्तराखंड की आबादी भले ही देश की आबादी का सिर्फ एक फीसद हो, लेकिन इसके मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी विज्ञापन पर रोजाना 55 लाख रुपये खर्च कर रहे हैं। ‘न्यूजलॉन्ड्री’ की एक रिपोर्ट बताती है कि धामी के मुख्यमंत्री बनने से पहले विज्ञापन पर कुल खर्च 77.71 करोड़ रुपये था, जबकि धामी के मुख्यमंत्री बनने के बाद 2024-25 में यह राशि चार गुना बढ़कर 227.35 करोड़ रुपये हो गई। रिपोर्ट में पांच साल के दौरान सरकारी खर्च की पड़ताल की गई है।

अगस्त में जब प्रदेश का गांव-गांव बाढ़ की चपेट में था, राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र प्रधानमंत्री और धामी के विज्ञापनों से भरे पड़े थे, जिनमें उत्तराखंड को प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में प्रचारित किया जा रहा था। पिछले पांच सालों में भाजपा सरकार ने विज्ञापन पर 1,001.07 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। इसमें से 402 करोड़ रुपये टीवी विज्ञापनों पर और बाकी राशि इस प्रकार वितरित की गई: समाचार पत्रों को 129.6 करोड़ रुपये, समाचार एजेंसियों को 128.7 करोड़ रुपये, डिजिटल मीडिया को 61.9 करोड़ रुपये, एसएमएस के लिए 40.4 करोड़ रुपये और रेडियो को 30.9 करोड़ रुपये। कुल मिलाकर, मीडिया प्लेटफॉर्म पर 923 करोड़ रुपये खर्च किए गए।

इस विशाल मीडिया खर्च का सबसे खास पहलू है नगालैंड, असम और ओडिशा स्थित समाचार चैनलों को दिल खोलकर पैसे देना, जबकि इन राज्यों का उत्तराखंड से सीधा-सीधा कोई वास्ता ही नहीं। यह सब तब है जब राज्य 73,000 करोड़ रुपये के कर्ज में डूबा हुआ है और आपदा राहत कार्यों तथा हाल में क्षतिग्रस्त हुए महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को दुरुस्त करने के लिए संघर्ष कर रहा है। पैसे की तंगी से जूझ रही सरकार अपने सीमित संसाधनों को राज्य के बाहर के चैनलों पर क्यों लगा रही है,यह सवाल तर्क से परे है।

राजनीति और पेपर लीक

परीक्षा जगत में सबसे ताजा घोटाला 17 सितंबर को आयोजित उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की परीक्षा से जुड़ा है। पेपर हरिद्वार के एक परीक्षा केन्द्र से खालिद मलिक नाम के अभ्यर्थी के कारण लीक हुआ था। उसने अपने फोन से अपनी बहन को प्रश्न भेजे, जो टिहरी में सहायक प्रोफेसर हैं। मलिक पकड़ा गया और अब सलाखों के पीछे है।

मुख्यमंत्री धामी, जो ‘लव जिहाद’, ‘जमीन जिहाद’ और ‘थूक जिहाद’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने के लिए कुख्यात हैं, ने इसके लिए भी एक नया नाम गढ़ लिया: ‘नकल जिहाद’। (विडंबना यह है कि पिछले अनुभव यही बताते हैं कि इन कथित ‘नकल जिहादियों’ में से ज्यादातर हिन्दू रहे हैं।

इस परीक्षा से ठीक दो दिन पहले भाजपा के पुराने वफादार और 2021 के पेपर लीक के मास्टरमाइंड हाकम सिंह शहर में इस ‘पेशकश’ के साथ आए कि अभ्यर्थियों को 10 लाख रुपये की ‘फीस’ के बदले नौकरी दी जाएगी! हाकम सिंह पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के करीबी हैं। हैरानी है कि अब वह भी सलाखों के पीछे हैं।

सितंबर में पेपर लीक के बाद बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, जिसमें हजारों लोग ‘बेरोजगार संघ’ के छात्र नेता बॉबी पंवार के नेतृत्व में देहरादून के परेड ग्राउंड में इकट्ठा हुए। 2026 में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए धामी खुद आए और सीबीआई जांच का वादा किया। यह शायद ही आश्वस्त करने वाला हो, क्योंकि यहां सीबीआई जांच आए दिन की बात हो गई है और इससे होता-जाता कुछ नहीं। उदाहरण के लिए: आठ साल पहले, पूर्व मुख्यमंत्री रावत ने ‘राष्ट्रीय राजमार्ग घोटाले’ में सीबीआई जांच का आदेश दिया था, जिसमें कई अफसरों ने किसानों की मुआवजा राशि हड़प ली थी। लेकिन इस मामले में अबतक कुछ नहीं हुआ।

माफियाओं के हाथ में स्वास्थ्य सेवा?

उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवा खस्ताहाल है जबकि सरकार कथित तौर पर सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों (सीएचसी) पर लाखों रुपये खर्च कर रही है। 1 अक्तूबर को बागेश्वर (अल्मोड़ा जिले) के सैकड़ों गांववालों ने सीएचसी में बुनियादी सुविधाओं की कमी के खिलाफ बेमियादी अनशन शुरू कर दी। स्थिति यह है कि गर्भवती महिलाओं को अक्सर बिना जांच ही लौटा दिया जाता है और गंभीर बीमारियों से पीड़ित छोटे बच्चों को दूर-दराज के शहरों के अस्पतालों में रेफर कर दिया जाता है।

सरकारी उदासीनता के खिलाफ जनता का गुस्सा तब फूटा जब देखभाल के अभाव में एक गर्भवती को सड़क किनारे बच्चे को जन्म देना पड़ा। पूर्व सैनिक भुवन कठायत और 85 वर्षीय बचे सिंह भी इस प्रदर्शन में शामिल हुए और मुख्यमंत्री धामी से आश्वासन मांगा कि बीमार लोगों की देखभाल ‘युद्धस्तर’ पर की जाएगी।

पत्रकार एसएमए काजमी के मामले से पता चलता है कि बड़े अस्पतालों में भी सुविधाएं सही नहीं। जून में दून अस्पताल में भर्ती काजमी की ट्रेकियोस्टोमी हुई। इससे पहले रोग विशेषज्ञ से सलाह नहीं ली गई। उनकी हालत बिगड़ती गई और उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा। मैक्स अस्पताल में जाने के बाद ही उनके फेफड़ों से लिक्विड सही तरीके से निकाला जा सका। राज्य में जो ‘सर्वश्रेष्ठ’ हैं, उनका यह हाल है!

काजमी ने बताया कि जहां विशेषज्ञों ने उत्कृष्ट देखभाल की, वहीं सामान्य कर्मचारी और नर्सें काफी हद तक उदासीन थीं। कमरों की कमी के कारण उन्हें ‘प्राइवेट होम केयर सर्विस’ का विकल्प चुनने की सलाह दी गई जिसपर अच्छा-खासा खर्च आता है। ऐसी सेवा देने वाले हालांकि अस्पताल के कर्मचारी नहीं थे लेकिन वे अक्सर चिकित्सा फैसलों को प्रभावित करते हैं और सलाह-मशविरा में भी शामिल होते हैं।

यूट्यूब चैनल ‘उत्तराखंड लाइव’ चलाने वाले पत्रकार राजीव प्रताप की मौत ने तो गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उत्तरकाशी में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर अपने हालिया खुलासों के लिए मशहूर राजीव करीब 10 दिनों तक लापता रहे और 28 सितंबर को उनका शव जोशीयारा बैराज में मिला। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में पेट और छाती में अंदरूनी चोटों की बात सामने आई, जिसकी वजह पुलिस ने ‘दुर्घटना’ को मान लिया। उनके परिवार को यह बात हजम नहीं हो रही। उनका दावा है कि राजीव को ‘स्वास्थ्य माफिया’ का पर्दाफाश करने के लिए निशाना बनाया गया। इन माफिया पर उपकरणों और दवाओं में लाखों की गड़बड़ी करने का आरोप है।

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